अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में आशीष मिश्रा की रचनाएँ

दिशांतर में-
धीरे-धीरे जब आँगन में
पुरानी है मूरत
बना प्रवासी एक देश मे
ब्रिटेन का पतझर
ये देश ये शहर
 

 

ये देश ये शहर

सपनों की सतह से ऊपर उड़ाता मुझे
ये देश ये शहर अब अपना बनाता मुझे

समय तो लगा कुछ गम भी सहे
कुछ आँसू बहे कुछ अंदर रहे
बहे सब बहाने, बनाने स्वयं को
बहुत कुछ दिया है नयेपन ने हमको
कह कर नया दिन जगाता मुझे

कभी तो कठिन-सा पहाड़ा दिया
कभी दीप भर कर सितारा दिया
रोशन हो मन तो अलग रात है
नये देश ने सब सहारा दिया
पतझड़ ये झड़ कर बताता मुझे

जीवन नया पर अलग तो नहीं
उड़ जा परिंदे फलक भी यहीं
काँटे भी होंगे और काटे भी होंगे
नये बाग में नव महक भी यहीं
और स्वागत में राहें दिखाता मुझे

१ दिसंबर २०२२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter