अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में विनीता शुक्ला की रचनाएँ

छंदमुक्त में-
उसको तो जाना ही था
जिजीविषा
जीवन का गणित
मुट्ठी भर रेत

 

मुट्ठी भर रेत

ये जीवन मानो -
मुट्ठी भर रेत

झरती हैं खुशियाँ झरते हैं सपने
इक पल हँसना तो दूजे पल क्लेश
ये जीवन मानो -मुट्ठी भर रेत

रेतघड़ी समय की चलती ही रहती
लम्हों की पूँजी हाथ से फिसलती
बस स्मृतियों के रह जाते अवशेष
ये जीवन मानों -
मुट्ठी भर रेत

किसी से हो मिलना किसी से बिछड़ना
जग के मेले में बंजारे सा फिरना
दुनिया आनी जानी- सत्य यह अशेष
ये जीवन मानों -
मुट्ठी भर रेत

१ मई २०२४

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter