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अगली कारगुजारी में
अब करें भी हम दुआ क्या
घाटों के ना घर के साहब
बेबसों की बेबसी की
मुझको भी है भान अभी

गीतों में-
उठो जमूरे
क्या लिखते हो
काशी के हम पण्डे जी
ख्वाब वक्त ने जिनके कुतरे
छेदों वाला पाल बुना रे

ठसक वही की वही रही
मौन विदुर से
लिक्खें किसको अब चिट्ठी

अंजुमन में-
इतना क्यों बेकल
खुशी भले पैताने रखना
थोड़े अपने हिस्से
धूप खड़ी दरवाज़े

छंदमुक्त में-
आजकल
कितने ही राम
कैसे
चिड़िया और कविता
चिड़िया की पलकों में
दीवारें
बचपन
मित्र के जन्म दिन पर
यों ही
विश्वास
शब्द पक रहे हैं

 

अगली कारग़ुज़ारी में

अगली कारग़ुज़ारी में
कातिल है तैयारी में

कहने की दुश्वारी में
उम्र कटी ख़ुद्दारी में

खेल दिखाएँगे हम भी
अपनी पहली पारी में

एक अकेले तुम्हीं नहीं
हम भी हैं बेज़ारी में

२९ जून २०१५

 

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