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अनुभूति में प्रदीप कांत की रचनाएँ-

गीतों में-
क्या लिखते हो
काशी के हम पण्डे जी
ख्वाब वक्त ने जिनके कुतरे
छेदों वाला पाल बुना रे

लिक्खें किसको अब चिट्ठी

अंजुमन में-
इतना क्यों बेकल
खुशी भले पैताने रखना
थोड़े अपने हिस्से
धूप खड़ी दरवाज़े

छंदमुक्त में-
आजकल
कितने ही राम
कैसे
चिड़िया और कविता
चिड़िया की पलकों में
दीवारें
बचपन
मित्र के जन्म दिन पर
यों ही
विश्वास
शब्द पक रहे हैं

  यों ही

सुबह
जब देखी
ओस से तर ब तर
पंखुड़ियाँ
उफन आया आँखों के सामने
तुम्हारी पलकों में ठहरा
एक कतरा समन्दर

अन्तस: में टँगी रही
रोटी की चिन्ताएँ
दोपहर भर

साँझ
चाहकर भी आँख नहीं मिला पाया
सूरज
मेरी बुढ़ाती आस से

रात-
बेशर्म चाँद ताकता रहा
मेरी उदासी को

तारे बतियाते रहे
रिश्तों की बारीकियाँ

फिर सुबह हो गई
दिन यों ही गुजरते रहे

 

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