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अनुभूति में प्रदीप कांत की रचनाएँ-

गीतों में-
क्या लिखते हो
काशी के हम पण्डे जी
ख्वाब वक्त ने जिनके कुतरे
छेदों वाला पाल बुना रे

लिक्खें किसको अब चिट्ठी

अंजुमन में-
इतना क्यों बेकल
खुशी भले पैताने रखना
थोड़े अपने हिस्से
धूप खड़ी दरवाज़े

छंदमुक्त में-
आजकल
कितने ही राम
कैसे
चिड़िया और कविता
चिड़िया की पलकों में
दीवारें
बचपन
मित्र के जन्म दिन पर
यों ही
विश्वास
शब्द पक रहे हैं

  शब्द पक रहे हैं

सुना है
शब्द पक रहे हैं

ज़मीन के उस टुकड़े पर
जो घिरा है
बन्दूकों के साये से
हाँ
शब्द पक रहें हैं

शब्दों का पकना भी
एक स्वाभाविक प्रक्रिया है
फसलों के पकने की तरह

किन्तु
फर्क है दोनों में बहुत

सदियाँ बीत जाती है
तब कहीं जाकर
पकते हैं शब्द

 

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