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इतिहास

तपती रेत का जीवन अघोषित सजा है
वही भोग रहे है अधिकतर लोग
जिन्हे हाशिये का आदमी कहता है
आज भी आधुनिक समाज।
फिक्र कहाँ होती तो
तपती रेत के जीवन पर पूर्ण विराम होता
गरीबी-भेद के दलदल में फंसा आदमी
तरक्की की दौड़ में शामिल होता आज।
कथनी गूँजती है करनी मुँह नोचती है
तपती रेत के दलदल में कराहता
हाशिये का आदमी तकदीर को कोसता है
जान गया है
न कर्म का और न तकदीर का दोष है
तरक्की से दूर रखने की साजिश है
तभी तो हाशिये का आदमी
पसीने और अश्रु से सींच रहा है
तपती रेत का जीवन आज।
तरक्की से बेदखल,आदमी की उम्मीदें टूट चुकी है
वह जी रहा है तपती रेत पर
सम्भावनाओं का आक्सीजन पीकर
तरक्की चौखट पर दस्तक देगी
जाग जायेगा विष-बीज बोने वालो के दिलों में
बुद्ध का वैराग्य और हर चौखट पर
दे देगी दस्तक तरक्की
यदि ऐसा नही हुआ तो आखिर में
एक दिन टूट जायेगा सब्र रच देगा इतिहास
आज का हाशिये का तरक्की से बेदखल समाज।

१४ जून २०१०

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