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अनुभूति में नंद भारद्वाज की रचनाएँ—

छंदमुक्त में-
एक आत्मीय अनुरोध

तुम यकीन करोगी
तुम्हारा होना
बरसों बाद
मैं जो एक दिन

 

मैं जो एक दिन

मैं जो एक दिन
तुम्हारी अधखिली मुस्कान पर रीझा,
अपनों की जीवारी और जान की खातिर
तुम्हारी आँखों में वह उमड़ता आवेग -
मैं रीझा तुम्हारी उजली उड़ान पर
जो बरसों पीछा करती रही -
अपनों के बिखरते संसार का,

तुम्हारी वत्सल छवियों में
छलकता वह नेह का दरिया
बच्चों की बदलती दुनिया में
तुम्हारे होने का विस्मय
मैं रीझा तुम्हारी भीतरी चमक
         और ऊर्जा के उनवान पर
जैसे कोई चाँद पर मोहित होता है -
कोई चाहता है -
नदी की लहरों को
    बाँध लेना बाहों में !

२० जनवरी २०१०

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