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अनुभूति में नंद भारद्वाज की रचनाएँ—

छंदमुक्त में-
एक आत्मीय अनुरोध

तुम यकीन करोगी
तुम्हारा होना
बरसों बाद
मैं जो एक दिन

 

एक आत्मीय अनुरोध

कहवाघरों की सर्द बहसों में
अपने को खोने से बेहतर है
घर में बीमार बीबी के पास बैठो,
आईने के सामने खड़े होकर
उलझे बालों को सँवारो -
           अपने को आँको,
थके हारे पड़ौसी को लतीफा सुनाओ
बच्चों के साथ साँप-सीढ़ी खेलो -
बेफ़िक्र फिर जीतो चाहे हारो,
कहने का मकसद ये कि
खुद को यों अकारथ मत मारो !

जरूरी नहीं
कि जायका बदलने के लिए
मौसम पर बात की जाए
खंख किताबों पर ही नहीं
चौतरफ दिलो-दिमाग पर
अपना असर कर चुकी है -

खिड़की के पल्ले खोलो
और ताजा हवा लेते हुए
कोलाहल के बीच
उस आवाज की पहचान करो
जिसमें धड़कन है ।

आँख भर देखो उस उलझी बस्ती को
उकताहट में व्यर्थ मत चीखो,
बेहतर होगा -
अगर चरस और चूल्हे के
धुएँ में फ़र्क करना सीखो !

२० जनवरी २०१०

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