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अनुभूति में रामेश्वर कांबोज हिमांशु की रचनाएँ--

अंजुमन में—
अंगार कैसे आ गए
अधर पर मुस्कान
आजकल
इंसान की बातें
ज़िंदगी की लहर
मुस्कान तुम्हारी

हास्य व्यंग्य में—
कर्मठ गधा
कविजी पकड़े गए

पुलिस परेशान

दोहों में—
गाँव की चिट्ठी
वासंती दोहे

कविताओं में—
ज़रूरी है
बचकर रहना
बेटियों की मुस्कान
मैं घर लौटा

मुक्तकों में—
सात मुक्तक

क्षणिकाओं में—
दस क्षणिकाएँ

गीतों में—
आ भाई सूरज
आसीस अंजुरी भर
इस बस्ती में
इस शहर में
इस सभा में
उजियारे के जीवन में

उदास छाँव
उम्र की चादर की
कहाँ गए
गाँव अपना
तुम बोना काँटे
दिन डूबा
धूप की चादर
धूप ने
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

  सात मुक्तक

एक

देश का हाल मत पूछो।
कोई सवाल मत पूछो।।
तुम बहता लहू देखकर।
कौन बेहाल मत पूछो।।

दो

धूल-धुआँ है, महानगर है।
आपाधापी डगर-डगर है।।
भीड़भाड़ बेगानापन है।
रिश्तों में भी घुला ज़हर है।।

तीन

घर-घर में संताप भरा है।
द्वार अनमना डरा-डरा है।।
किस घट से हम प्यास बुझाएँ।
हर घट प्यासा ज़हर-भरा है।।

चार

डूबे तो मझधार बहुत हैं।
दु:ख के पारावार बहुत हैं।।
जो हँसकर के जीना चाहे।
खुशियों के उजियार बहुत हैं।।

पाँच

उपाय सब बेकार हुए।
डाकू पहरेदार हुए।।
कानून कुचलने वाले।
आज अलंबरदार हुए।।

छे

सँभालकर तुम मेरा यह खत रखना।
दिल में कल भी वही मुहब्बत रखना।।
लिख नहीं सका था मैं इस पर कुछ भी।
कसम तुम्हें इसका मलाल मत रखना।।

सात

जो तुम चाहते हो मुस्काना।
मन अपना पावन कर लो।।
बेबस के आँसू पोंछो।
जीवन मन-भावन कर लो।।

२४ जुलाई २००५

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