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अनुभूति में रामेश्वर कांबोज हिमांशु की रचनाएँ--

अंजुमन में—
अंगार कैसे आ गए
अधर पर मुस्कान
आजकल
इंसान की बातें
ज़िंदगी की लहर
मुस्कान तुम्हारी

हास्य व्यंग्य में—
कर्मठ गधा
कविजी पकड़े गए

पुलिस परेशान

दोहों में—
गाँव की चिट्ठी
वासंती दोहे

कविताओं में—
ज़रूरी है
बचकर रहना
बेटियों की मुस्कान
मैं घर लौटा

मुक्तकों में—
सात मुक्तक

क्षणिकाओं में—
दस क्षणिकाएँ

गीतों में—
आ भाई सूरज
आसीस अंजुरी भर
इस बस्ती में
इस शहर में
इस सभा में
उजियारे के जीवन में

उदास छाँव
उम्र की चादर की
कहाँ गए
गाँव अपना
तुम बोना काँटे
दिन डूबा
धूप की चादर
धूप ने
लेटी है माँ

संकलन में—
नई भोर
नया उजाला

 

इस बस्ती में

जब-जब छुपकर वार करेगा
तब-तब वो मुस्काएगा।
बैठ सामने चारण बनकर
गुण जीभर कर गाएगा।।

दौर मुसीबत का जब होगा
साथ रहेंगे बेगाने।
वह अपनों का लगा मुखौटा
दूर कहीं छिप जाएगा।।

घाव लगे तन-मन पर लाखों
बैरी मरहम ला देंगे।
उसके वश में जितना होगा
उतना नमक लगाएगा।।

इस बस्ती में बैठके प्यारे
प्यार वफ़ा की बात न कर।
बंजर दिल की इस धरती पर
उपवन कौन खिलाएगा।।

अपनी चादर कितनी मैली
समय नहीं जो देख सके।
उजली चादर जिनकी दिखती
उस पर दाग़ लगाएगा।।

२६ मई २००८

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