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तितली का मन
दरवाज़ा
पीठ
रात
लगातार
 

 

तितली का मन

फूल पर मंडराती तितली का मन
एक दिन फूल होने का हुआ
उस एक दिन
उड़ता रहा फूल दिन भर
डगाल से हिलगा हिलगा
चट्टान पकड़कर
झूलता रहा लड़का
हवा में दिन भर
हवा भी लड़के के साथ-साथ दिन भर

चुंबक धरती के भीतर था
सब कुछ की जड़ की तरह
सब कुछ धरती पर था
सब कुछ में शामिल थे-
बैठे-बैठे उड़ता फूल
और बैठे-बैठे उड़ते फूल पर
उड़ते-उड़ते बैठी तितली।

१४ जनवरी २००८

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