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औरत
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कल
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तितली का मन
दरवाज़ा
पीठ
रात
लगातार
 

 

कल

कल, कल होगा
रोका नहीं जा सकता कल को
होने से
कुछ भी हो सकता है कल को
हो सकता है चलने-फिरने लगें
पेड़-पौधे-मकान
हो सकता है चलते-चलते
खड़े के खड़े रह जाएँ हम
अपनी-अपनी जगह
उड़ने लगें खेत-नदियाँ और पहाड़
फूट निकलें कोंपलें हवा में
हो सकता है कल को
अलोप हो जाए पूरी दुनिया
दिखने लग जाएँ कल से
मृत्यु-आत्मा और ईश्वर
संभव है कल को
भूल जाएँ हमें
अपनी भाषा
समझ न आए बात
किसी को
किसी की।

१४ जनवरी २००८

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