अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में हरि ठाकुर की रचनाएँ-

गीतों में-
किरन मंत्र
जो सन्नाटे को तड़का दे
फूलों ने अधर न खोले
वृक्ष खोजते अभय शरण
स्वर्णिम संकल नहीं बनूँगा
सूरज का रथ

 

जो सन्नाटे को तड़का दे

कोई तो ऋतु आए ऐसी
जो फूलों को फिर महका दे।

फैली चारों ओर विरसता
कभी न कोई खुल कर हँसता
कितनी है घनघोर विवशता
कुछ तो सुलगे ऐसा जो
इस ठंडे लोहे को दहका दे।।
कोई तो ऋतु...

उब गए अभिनय दुहराते
बिना रीढ़ के दौड़ लगाते
काग़ज़ की नैया तैराते
कोई तो तोड़े पिंजरे को
जो हर पंछी को चहका दे।।
कोई तो ऋतु...

हम नौकर अपने शरीर के
हम फकीर अब तक लकीर के
निकल न पाए तिमिर चीर के
निकले कोई चीख गले से
जो सन्नाटे को तड़का दे।।

कोई तो ऋतु आए ऐसी
जो फूलों को फिर महका दे।।

१० मार्च २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter