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अगर बढ़ेगी दिल की दूरी
आँखों से जाने उसने क्या
आदमी की भीड़ में
आदमी को और भला

आपसे कुछ कहें
उदासी के समंदर को
उसके सीने में
कभी जो बंद कीं आँखें
कभी बादल कभी बिजली
किसी भी बात से
कुछ न करते बना
खुद में रहने की आदत
गया कोई
चाँदनी को क्या हुआ
जब से दिलों का फ़ासला
ज़मीं से आसमानों तक
जो पत्थर काटकर
जो पत्थर तुमने मारा था मुझे
दर्द बनकर आईना
दिल की सदा
दिया है दर्द जो तूने
दुखों के दिन
दूर तक जिसकी नज़र
धूप राहों में
पता नहीं
पहलू में उनके
पेड़ पौधा झील झरना
मुझको किनारा मिल गया
मुद्दत के बाद
मेरे मालिक
मेरे लिए
यह सुना है
यादों ने आज
वफ़ा का गीत
वो इंसां भी
सितम जिसने किया मुझ पर
सुनामी के प्रति
सुरों में ताल में
हम बिखर भी गए
हर सितम हर ज़ुल्म

संकलन में-
शुभ दीपावली- वहीं पे दीप जलेगा

 

आपसे कुछ कहें

आपसे कुछ कहें तो कहें किस तरह
बिन कहे भी रहें तो रहें किस तरह

आपसे जो मिले तो मिली बेखुदी
होश बाकी रहें तो रहें किस तरह

दर्द सीने में ग़ैरों का जमता गया
दर्द अपना सहें तो सहें किस तरह

छाँव में भी हमें धूप लगती रही
हम किसी से कहें तो कहें किस तरह

नाव खुशियों की सूखी नदी में खड़ी
मौज में हम बहें तो बहें किस तरह

आज घायल हुआ है जो नूरे वफ़ा
अब उजाले रहें तो रहें किस तरह

२४ मार्च २००८

 

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