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पत्र व्यवहार का पता

१२. १. २००९

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उत्तम पुरुष

  दिल में राज़ दफ़न रखता है
उँगली में धड़कन रखता है।
पूछो मत तासीर जुनूँ की
सिर पर बाँध कफ़न रखता है।

वह मड़ई का राजकुँवर हैं
धारदार उसके सपने भी
देवदारु-सा पौरुष उसका
जलते हैं उससे अपने भी

दिखता भले शिला-सा शीतल
उर में तेज़ अगन रखता है।

वह खंडहर की मूरत, जलता
आँधी में दीप सरीखा
कंगन-कुंकुम बनकर उसने
शमशानों में पलना सीखा

पग में नृत्य प्रलय का, कर में
नूतन विश्व-सृजन रखता है।

वह उठता धरती से जैसे
अंकुर फूटा हो भूतल से
वह गिरता भी तो जैसे
आशीष बरसता गगनांचल से

सूरज-चाँद उसी के, मुट्ठी में
उनचास पवन रखता है।

- बुद्धिनाथ मिश्र

इस सप्ताह

गीतों में-

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छंद मुक्त में-

पिछले सप्ताह
५ जनवरी २००९ के अंक में

संकलन में नई नववर्ष रचनाएँ-
मनीषा कुलश्रेष्ठ, शशि पाधा, मधुलता अरोरा, अभिरंजन कुमार और मानोशी चैटर्जी

पुनर्पाठ में-
राजेंद्र गौतम

अंजुमन में-
आदम गोंडवी

दिशांतर में-
यू.एस.ए. से प्रतिभा सक्सेना

छंद मुक्त में-
रवींद्र स्वप्निल प्रजापति

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प्रकाशन : प्रवीण सक्सेना -|- परियोजना निदेशन : अश्विन गांधी
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