अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में शशिकांत सिंह शशि की रचनाएँ -

छंदमुक्त में-
क्रांतिबीज
चाहत
जादूगर और कलुआ
बयान


 

  क्रान्तिबीज

माटी से हम गढ़ ही लेंगे
अपना सूरज
अंधकार का
आतातायी राज मिटेगा।

मिट जायेगा तम
या हम ही मिट जायेंगे
मिट भी गये तो भस्म सदृश
पूजे जाएँगे।

मोड़ ही देंगे
नदियों की निष्ठुर धारा को
सीचेंगे युग-युग से प्यासे
मरूस्थल को
बही नही जलधार तो
हम ही बह जायेंगे
सागर की छाती पर
नर्तन कर आयेंगे।

'प्यार' लिखेंगे
अम्बर के अकड़े माथे पर,
धरती के सपनों को
नभ तक पहुँचाएँगे
स्वप्न यदि टूटा तो बिखरेगा अतंर्मन,
क्रांतिबीज बन कण-कण में
हम रम जाएँगे।

१० फरवरी २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter