अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में शशिकांत सिंह शशि की रचनाएँ -

छंदमुक्त में-
क्रांतिबीज
चाहत
जादूगर और कलुआ
बयान


 

 

चाहत

धूप चाहती थी
फूस के टूटे घरों में जाना
झुग्गी झोपड़ियों को जगाना
किन्तु जा न सकी
अट्टालिकाओं की ऊँचाई नापती रह गई
दूर कर न सकी भीमकाय भवनों की छाया।

नदी चाहती थी
किसान के खुश्क चेहरों को पोंछना
मिट्टी से खेलना
खेतों में बनाना घर-घरौंदा
जा न सकी, बाँध के क्रुर पंजों में फँस कर रह गई।
पी गये उसे आधुनिक अगस्त्य।

हवा चाहती थी
बीमार बच्चों को गोद में लेना
सीलन बदबू दूर करना
लाना उसके लिए तितली और फूल
ले जाना उसे चाँद के आँगन में
पार कर न सकी
इस्पाती पाबंदियों को ।


१० फरवरी २०१४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter