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चुप रहना
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चुप रहना
बातें मन की मत कहना
बादल घुमड़ते हैं अन्तस में झरने दो
रीता है मन घट बस बूँद बूँद भरने दो
कोमलतम रेशों का
तिल-तिल हो कर दहना
मत कहना
पोखर की मौन शाम बेला संझवाती की
खोई वो आहट जी मन को महकाती थी
साधों के दीपक का
धार-धार हो बहना
मत कहना
कँपती बुनियादों का मौन संवादों का
बीत गया मौसम उन कसमों का वादों का
सपनों के शिखरों का
अनायास ही ढहना
मत कहना
- मधु प्रधान |
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इस माह
गीतों में-
अंजुमन में-
छंदमुक्त में-
छंदों में-
पुनर्पाठ
में-
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विगत माह
१ जून २०२५
को प्रकाशित अंक में

गीतों में- इंदिरा परमार
अंजुमन में-
सुशील यादव
छंदमुक्त
में- डॉ.
नेहा शर्मा
छंदों में-
अश्विनी पांडे
पुनर्पाठ
में- दिव्यनिधि शर्मा
की रचनाएँ
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