पत्र व्यवहार का पता

अभिव्यक्ति तुक-कोश 

१. ७. २०२५1

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चुप रहना
 

 

 

चुप रहना
बातें मन की मत कहना

बादल घुमड़ते हैं अन्तस में झरने दो
रीता है मन घट बस बूँद बूँद भरने दो
कोमलतम रेशों का
तिल-तिल हो कर दहना
मत कहना

पोखर की मौन शाम बेला संझवाती की
खोई वो आहट जी मन को महकाती थी
साधों के दीपक का
धार-धार हो बहना
मत कहना

कँपती बुनियादों का मौन संवादों का
बीत गया मौसम उन कसमों का वादों का
सपनों के शिखरों का
अनायास ही ढहना
मत कहना

- मधु प्रधान
इस माह

गीतों में-

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मधु प्रधान

अंजुमन में-

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अश्विनी कुमार विष्णु

छंदमुक्त में-

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महेश केसरी

छंदों में-

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तारकेश्वरी की कुंडलिया

पुनर्पाठ में-

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दिवाकर वर्मा

 

विगत माह
१ जून २०२५ को प्रकाशित अंक में

गीतों में- इंदिरा परमार
अंजुमन में- सुशील यादव
छंदमुक्त में- डॉ. नेहा शर्मा
छंदों में-
अश्विनी पांडे
पुनर्पाठ में- दिव्यनिधि शर्मा
की रचनाएँ

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