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तारकेश्वरी सुधि

जन्म - १० जुलाई १९७३ को गाँव
सिलपटा, अलवर, राजस्थान में।
प्रकाशित कृतियाँ -
सुधियों की देहरी पर (दोहा संग्रह), रसरंगिनी (मुकरी संग्रह),
शब्द वीणा (कुंडलिया संग्रह) राजस्थान साहित्य अकादमी से
अनुदानित, बाल पहेलियाँ (जवाहर लाल नेहरु बाल साहित्य अकादमी
द्वारा प्रकाशित) आधुनिक मुकरियाँ (संपादन), अनेक साझा संकलनों
में दोहे, गीत, ग़ज़ल, कुंडलिया, लघुकथा प्रकाशित। इसके अतिरिक्त
विभिन्न दैनिक व मासिक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन।
सम्मान एवं पुरस्कार-
जवाहर लाल नेहरू बाल साहित्य अकादमी द्वारा बाल साहित्य सृजक
सम्मान तथा अवध साहित्य अकादमी द्वारा अनन्य हिंदी सहयोगी
सम्मान ।
सम्प्रति -शिक्षिका व स्वतंत्र लेखन
संपर्क--truyadv44@gmail.com
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कुंडलिया छंद
आनंदित भू हो रही, खुश हैं वृक्ष
तमाम।
नभ में तम्बू गाड़कर, जब बैठा घनश्याम।।
जब बैठा घनश्याम, देख हलधर मुस्काया।
जर्जर तन में जोश, स्वप्न आँखों मे आया।
कहती है सुधि सत्य, धरा जब होगी सिंचित।
होगा नवनिर्माण, प्रकृति होगी आनंदित।।
दिनकर जब थककर गया, सोने अपने गाँव।
शबनम आई फूल से, मिलने चुपके पाँव।।
मिलने चुपके पाँव, पुष्प से मिल इतराई।
शब भर उसके संग, बैठ कर वह बतियाई।
कहती है सुधि सत्य, मिटी फिर खुद ही हँसकर।
बचा न पाया पुष्प, सुबह जब आया दिनकर।।
कितनी है उपयुक्तता, उन्हें कहाँ है बोध।
लहरें उच्छृंखल बनी, तट का करें विरोध।।
तट का करें विरोध, आजमा कर नाना गुर।
होकर बस बेफिक्र, तोड़ने को तट आतुर।
तोड़ आज तटबंध, हुईं उल्लासित इतनी।
भूल गईं ये बात, हदें उनकी हैं कितनी।।
संगत शुभ इंसान की, करती राह प्रशस्त।
अविवेकी हम आपको, करे अकारथ व्यस्त।।
करे अकारथ व्यस्त, कीमती समय गँवाते।
मेहनतकश इन्सान, लाभ जीवन का पाते।
कहती है सुधि सत्य, बदल जीवन की रंगत।
इसे गँवा मत व्यर्थ, सोच कर चुनना संगत।।
दुनिया एक किताब है, पढ़ कर देखें आप ।
इसके हैं पन्ने अधिक, बहुत बड़ा परिमाप ।।
बहुत बड़ा परिमाप, विविधताओं से चित्रित।
अलग-अलग हर शब्द, मगर सारे हैं ग्रंथित।
कहती है सुधि सत्य, अलग सबका है हुलिया।
शब्द-शब्द है खास, देखिए पढ़कर दुनिया।।
मेहनत ही संसार में, सदा बढ़ाती मोल ।
घिस-घिसकर पत्थर हुआ, पूजित शिवलिंग गोल।।
पूजित शिवलिंग गोल, करें श्रम अगर निरंतर ।
बदले जीवन दृश्य, बसे खुशियाँ मन-अंदर ।
कहती है सुधि सत्य, कर्म में हो जाएँ रत।
तय कर जीवन-लक्ष्य, करें जी भर कर मेहनत।। |