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वे रंग

 

काश

मेरी आत्मा से एक
चीख निकलती है जब
देखती हूँ उन्हें जो...
सर्द हवा के झोंकों में
एक फटी-सी चादर
अपने तन से लपेटे
कंक्रीट के सख्त फुटपाथों पर
सोने की नाकाम कोशिश में हैं...
उन्हें जो...
भूखे पेट-आँखें खोले
सूने आसमान को निहारते
अपने उस भगवान को याद करते हैं
जिसने उन्हें जन्म दिया
और-
अनाथ-अबोध बच्चों को
जिन्हें ममता का एक
टुकड़ा आँचल भी
दुबकने को न मिला
मेरी इसी अंतरात्मा की चीख से
जन्म लेता है एक
'काश'
जो कर देता है छिन्न-भिन्न मुझे
मैं सोचने लगती हूँ
कि काश-ये 'काश' न होता तो
शायद कोई उदास न होता...

९ जुलाई २००४

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