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मैं डरता हूँ
अपना बचपना खोने से
सहेज कर रखा है उसे
दिल की गहराइयों में
जब भी कभी व्यवस्था
भर देती है आक्रोश मुझमें
जब भी कभी सच्चाई
कड़वी लगती है मुझे
जब भी कभी नहीं उबर पाता
अपने अंतर्द्वद्वों से
जब भी कभी घेर लेती है उदासी
तो फिर लौट आता हूँ
अपने बचपन की तरफ़
और पाता हूँ एक मासूम
एवं नि छल-सा चेहरा
सरे दुख-दर्दों से परे
अपनी ही धुन में सपने बुनता।

११ अगस्त २००८

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