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गीतों में-
गाँव
प्यास नदी की
मन का उपवन
मन-वृंदावन

सोया शहर

नए दोहे-
यह जीवन बहुरूपिया

कुंडलियों में-
कुंडलियाँ (अपनी अपनी अहमियत)

नए दोहे-
दोहे

हाइकु में-
हाइकु सुखद भोर

 

गाँव

पहले जैसा
प्रेम- गंध से भरा
अभी भी गाँव।

रिश्ते नातों में
अब तक बाकी है
अपनापन
बरस रहे
हर ड्योढ़ी - आँगन
सुख - सावन

भरी धूप में
सुखमय लगती
पीपल छाँव।

सुख दुःख मे
सम्मिलित होकर
जीते जीवन
मानवता ही
सबसे बढ़कर
जीवन - धन

बिछा न पायी
मलिन कुटिलता
अपने दाँव।

२३ अप्रैल २०१२

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