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अनुभूति में शशि पुरवार की रचनाएँ -

नये गीतों में-
कमसिन साँसें
तिलिस्मी दुनिया
थका थका सा
दफ्तरों से पल
भीड़ का हिस्सा नहीं हूँ
याद की खुशबू
समय छिछोरा

गीतों में-
अब्बा बदले नहीं
कण-कण में बसी है माँ
मनमीत आया है
महक उठी अँगनाई
व्यापार काला

 

 

अब्बा बदले नहीं

अब्बा बदले नहीं
न बदली है उनकी चौपाल

अब्बा की आवाज गूँजती
घर आँगन थर्राते हैं।
मारे भय के चुनियाँ मुनियाँ
दाँतों, अँगुली चबाते हैं।

ऐनक लगा कर आँखों पर
पढ़ लेते हैं मन का हाल

पूँजी नियम- कायदों की हाँ
नित प्रातः ही मिल जाती है
टूट गया यदि नियम, क्रोध से
दीवारे हिल जाती हैं।

अम्मा ने आँसू पोंछे गर
मचता तुरत बबाल।
पूरे वक़्त रसोईघर में
अम्मा खटती रहती है।
अब्बा के संभाषण अपने
कानों सुनती रहती है।

हँसना भूल गयी है
खुद से करती यही सवाल।

१० मार्च २०१४

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