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अनुभूति में संतोष कुमार सिंह की रचनाएँ —

नए गीत
चलें यहाँ से दूर
जग यूँ दीख रहा
फिर कैसे दूरी हो पाए
मन जुही सा
रूठ गई मुस्कान

गीतों में
अपना छोटा गाँव रे
इस देश को उबारें
ऐसी हवा चले
गाँव की यादें
जा रहा था एक दिन
धरती स्वर्ग दिखाई दे
नारी जागरण गीत
मीत मेरे
ये बादल क्यों रूठे हैं
श्रमिक-शक्ति

सोचते ही सोचते

शिशु गीतों में-
डॉक्टर बंदर
भालू
सूरज
हिरण

संकलन में
ममतामयी-माँ

 

अपना छोटा गाँव रे!

हमको तो प्यारा लगता, अपना छोटा गाँव रे।
चलो-चलो बाग़ों में खाएँ,जी भर के हम आम रे।।

काले भ्रमरों-सी जामुन भी, दीख रहीं डाली-डाली।
लाठी लेकर करता रहता, माली हरदम रखवाली।।
फिर भी बच्चे छुपकर तोड़ें, अमियाँ यहाँ तमाम रे।. . .

हल से जोतें खेतों को फिर, उस पर चले पटेला है।
हमको बिठा पटेला ताऊ, मींड़ा करते ढेला है।।
दादा के संग दाँय चलाएँ, लेते रहें विराम रे।. . .

हरियाली के नीचे सुख से, निर्धनता भी सोई है।
यहाँ प्रदूषण का ख़तरा भी हमको लगे न कोई है।।
बैठ आम के नीचे पढ़ते, आए न छनकर घाम रे।. . .

ठाकुर-बामन, नाई-तेली, हरिजन, जाटव, सक्का भी।
संकट के क्षण हो जाता है सारा गाँव इकठ्ठा भी।।
सभी धर्म मिल कर हैं रहते, झगड़े का क्या काम रे।. . .

24 अगस्त 2007

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