अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में नवीन चतुर्वेदी की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
अब इस दयार में
ऐलाने सहर
गनीमत से गुजारा
तमाम ख़ुश्क दयारों को
सच्ची श्रद्धा व सबूरी

अंजुमन में-
गाँवों से चौपाल
दिन निकलता है
न तो शैतान चाहिये
रूप होना चाहिये
हमें एक दूसरे से

गीतों में-
चल चलें एक राह नूतन
छंदों के मतवाले हम
मजबूरी का मोल
यमुना कहे पुकार

संकलन में-
होली है- हुरियार चले बरसाने
वटवृक्ष- बरगद
खिलते हुए पलाश- खिलते हुए पलाश

 

मजदूरी का मोल

मजदूरी का मोल
यहाँ अधिक, पर
वहाँ लगे कम
ये कैसा है झोल
ओ भैया ये कैसा है झोल

कस्बों में रिक्शे वाले
पाँवों से रिक्शे हाँक रहे
सर पे तपती धूप
बदन के हर हिस्से से
स्वेद बहे

ढो कर हम को एक मील
दस-बीस रुपल्ली मात्र गहे
गमछे से फिर पौंछ पसीना
मुँह से मीठे बोल कहे

उस पर हम
तन कर उस से
बोलें बस कड़वे बोल
ओ भैया ये कैसा है झोल

शहरों के ऑटो - टेक्सी वालों के
नखरे क्या बोलें
मन में हो तो आवें
मन में ना हो तो - फट ना बोलें

लें समान की अलग मजूरी
जो चाहें जैसा बोलें
उस पर हम डरते डरते
उनको ड्राईवर भैया बोलें

जो माँगें
खामोशी से
दे देते हैं दिल खोल
ओ भैया ये कैसा है झोल

२५ जुलाई २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter