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नई रचनाओं में-
अब इस दयार में
ऐलाने सहर
गनीमत से गुजारा
तमाम ख़ुश्क दयारों को
सच्ची श्रद्धा व सबूरी

अंजुमन में-
गाँवों से चौपाल
दिन निकलता है
न तो शैतान चाहिये
रूप होना चाहिये
हमें एक दूसरे से

गीतों में-
चल चलें एक राह नूतन
छंदों के मतवाले हम
मजबूरी का मोल
यमुना कहे पुकार

संकलन में-
होली है- हुरियार चले बरसाने
वटवृक्ष- बरगद
खिलते हुए पलाश- खिलते हुए पलाश

 

 

चल चलें इक राह नूतन

चल चलें इक राह नूतन

भय न किंचित
हो जहाँ पर
पल्लवित सुख
हो निरंतर
अब लगाएं
हम वहीँ पर
बन्धु - निज आसन

द्वेष - ईर्ष्या
को न प्रश्रय
दुर्गुणों की
हो पराजय
हो जहाँ बस
प्रेम की जय
खिल उठे तन मन

२५ जुलाई २०११

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