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नयी रचनाओं में- 
कहीं पर
कुलाँचें
जख्मों का अहसास नहीं
मैं थोड़ा मुस्कराना
हम समंदर

अंजुमन में-
आज अपना दर्द
कुछ घटना कुछ क्षण
लो बोझ आसमान का
वक्त को कुछ और
शब्द जल जाएँगे

गीतों में-
उकेरो हवा में अक्षर
कबूतर लौटकर नभ से
गीत है वह

टूटते नक्षत्र सा जीवन
धूप आगे बढ़ गयी
पोंछ दिया मैलापन
मत कहो
मुद्राएँ बदल-बदलकर
सब कुछ नकार दो
हम टँगी कंदील के बुझते दिये

 

जख्मों का अहसास नहीं

जिसको मेरे जख्मों का अहसास नहीं
मुझे किसी मरहम की उससे आस नहीं

गरज रहा है आसमान की छाती पर
उस बादल का धरती को विश्वास नहीं

नए मुखौटे बदल-बदल कर नाटक में
अभिनय को जीवन देना परिहास नहीं

अन्धकार से लड़ने के संकल्पों का
उसकी करनी-कथनी से आभास नहीं

सूखे होठों पर बस जीभ फिराने से
टल तो जाती लेकिन मिटती प्यास नहीं

१ दिसंबर २०१७

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