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अनुभूति में हरीश निगम
की रचनाएँ—

नए गीतों में-
दुख नदी भर
बादल लिखना
बिखरे हैं पर
फुनगियों तक बेल
मँझधार में रहे

शिशु गीतों में—
धूप की मिठाई
पंख दिला दो ना

गीतों में—
इस नगर से
ऊँघता बैठा शहर
कहाँ जाएँ
चाँदनी सिसकी
ज़िंदगी की बात

पनघटों पर धूल
शेष हैं परछाइयाँ

संकलन में—
वसंती हवा – फागुन में
ज्योतिपर्व – फुलझड़ियाँ लिख देतीं

 

OOपंख दिला दो ना

पंख नहीं मेरे अम्मा
पंख नहीं मेरे।
अम्माँ पंख दिला दो ना।

तितली से मँगवा दो ना,
मोरों से दिलवा दो ना,
गुण गाऊँगी
मैं तेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

मिल जाएँ जो मुझको पर
धरती से पहुँचूँ अंबर,
पल में कर लूँ
सौ फेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

उड़कर मिलूँ पतंगों से
इंद्रधनुष के रंगों से
घूमूँ परियों
के डेरे!
अम्माँ पंख दिला दो ना।

१४ अप्रैल २००८

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