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अनुभूति में हरीश निगम
की रचनाएँ—

नए गीतों में-
दुख नदी भर
बादल लिखना
बिखरे हैं पर
फुनगियों तक बेल
मँझधार में रहे

शिशु गीतों में—
धूप की मिठाई
पंख दिला दो ना

गीतों में—
इस नगर से
ऊँघता बैठा शहर
कहाँ जाएँ
चाँदनी सिसकी
ज़िंदगी की बात

पनघटों पर धूल
शेष हैं परछाइयाँ

संकलन में—
वसंती हवा – फागुन में
ज्योतिपर्व – फुलझड़ियाँ लिख देतीं

  इस नगर से

इस नगर से
आ गए हम तंग।

भीड़ का
पीकर ज़हर हँसते रहो
रोज़ उजड़ो
और फिर बसते रहो
किस तरह के

ये नियम, ये ढंग
इस नगर से
आ गए हम तंग।

थी बहुत
अपनी नदी मीठा कुआँ
खो गए सब
बच रहा काला धुआँ
लग गई है
ज़िंदगी में जंग
इस नगर से
आ गए हम तंग।

९ अक्तूबर २००५

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