अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में देवेन्द्र शर्मा इंद्र की रचनाएँ-

अंजुमन में-
फूल शाखों से
यूँ देर से
हर इक रिश्ते
हर शाम चिरागों सा

गीतों में-
अब भी जीवित मुझमें
उस शहर से
एक गाथा का समापन
जब जब भी झंझा
मैं तुम्हारी लेखनी हूँ

मैं नवांतर
मैं शिखर पर हूँ
लौटकर घर चलो खुसरो
साँझ के कंधे पर
हम जीवन के महाकाव्य

 

हर शाम चराग़ों-सा

हर शाम चराग़ों-सा जलाया गया हूँ मैं
होते ही सुब्ह रोज़ बुझाया गया हूँ मैं

चुनता रहा हूँ फूल मैं ख्वाबों के रात भर
ख़ारों के बिस्तरों पे सुलाया गया हूँ मैं

आँखों से मेरी बर्फ़ के दरिया रवॉँ हुए
शोलों की वादियों में घुमाया गया हूँ मैं

होती है ज़ोरे-जब्र की भी इंतिहा कोई
क्यूँकर हँसा-हँसा के रुलाया गया हूँ मैं

मेरे ही साथ क्यूँ किया कि़स्मत ने ये मज़ाक
बैठा के अर्श पे जो गिराया गया हूँ मैं

जिसका नहीं जवाब मैं वो इक सवाल हूँ
महफि़ल में रोज़-रोज़ उठाया गया हूँ मैं

सहरा के होंठ पर उगा इक लफ़्ज़ 'प्यास' हूँ
लिख-लिख के पानियों पे मिटाया गया हूँ मैं

५ जुलाई २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter