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नये गीतों में-
अलकापुरी की नींद टूटे
पहले जैसा
प्रेमचंद जी
ये शहर तो

सुनो राजन

गीतों में-
इसी शहर मे खोया
गंध बाँटते डोलो
बुलबुल के घर
सगुनपंछी
होंठ होंठ मुस्काएँगे

 

ये शहर तो

ये शहर तो
रेत से उजले चमकते हैं

आदमी तो खोज में
जल की भटकता है
दोपहर क्या दिन सुबह
से ही अखरता है

साँझ से ही
मन उलूकों के उछलते हैं

धूप महलों में प्रिये
वातास के झोंके
कौन जाने कब उठेगी
साँस मुँह धोके

राजपथ
पगडंडियो के तन कुचलते हैं

इस महल में आग
हँसती लोग जलते हैं
और हँस-हँस कर
सियासत खेल चलते हैं

चाँदनी
तन निर्वसन कितने मचलते हैं

२२ दिसंबर २०१४

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