अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में आचार्य भगवत दुबे की रचनाएँ-

गीतों में-
आप बड़े हैं
ऋचाएँ प्रणय-पुराणों की
झोंपड़ी के कत्ल का संशय हुआ है
नींद जाने कब खुलेगी
साँड़ तगादों के

 

ऋचाएँ, प्रणय-पुराणों की

छूते ही हो गयी देह कंचन, पाषाणों की,
हैं कृतज्ञ धड़कनें, हमारे
पुलकित प्राणों की!

खंजन नयनों के नूपुर जब तुमने खनकाये,
तभी मदन के सुप्त पखेरू ने पर फैलाये।
कामनाओं में होड़ लगी
फिर उच्च उड़ानों की।

यौवन की फिर उमड़-घुमड़कर बरसी घनी घटा,
संकोचों के सभी आवरण हमने दिये हटा।
स्वतः सरकने लगी यवनिका
मदन-मचानों की।

अधरों से, अंगों पर, तुमने अगणित छन्द लिखे,
गीत, एक-दो नहीं, केलि के कई प्रबन्ध लिखे।
हुई निनादित मूक ऋचाएँ,
प्रणय-पुराणों की।

कभी मत्स्यगंधा ने पायी थी सुरभित काया,
रोमांचक अध्याय वही फिर तुमने दुहराया।
परिमलवती हुई कलियाँ
उजड़े उद्यानों की।

३ दिसंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter