अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में बनवारीलाल खामोश की रचनाएँ-

गीतों में-
दिन
मौसम आना जी
रिश्ते
हम अपने काँटों के मारे

  रिश्ते

उलझे-सुलझे धागे रिश्ते।
कुछ सोये
कुछ जागे रिश्ते।

कुछ जन्मों से लेकर आये
कुछ राहों में हमने कमाये
कुछ चाहे पर जुड नहिं पाये
कुछ छूटे ना लाख छुडाये
निर्मोही-
निरभागे रिश्ते।

परिचय के कन्धों पर लादे
अवसर की गठरी में बांधे
पल-पल रीते पल-पल साधे
आधे मन से पाये आधे
भीख सरीखे
माँगे रिश्ते।

जिस ढब जीवन चलते जाते
रिश्ते अपने रंग दिखाते
दौर कभी ऐसे भी आते
गाते-रोते रोते-गाते
मजबूरी के
आगे रिश्ते।

२६ नवंबर २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter