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अनुभूति में गिरिजाकुमार माथुर की रचनाएँ-

गीतों में-
कौन थकान हरे जीवन की

छाया मत छूना

कविताओं में-
आज हैं केसर रंग रंगे वन
चूड़ी का टुकड़ा
ढाकबनी
नया कवि
पन्द्रह अगस्त
बरसों के बाद कभी

संकलन में-
वर्षा मंगल- भीगा दिन
मेरा भारत- हम होंगे कामयाब

 

छाया मत छूना

:छाया मत छूना मन, होता है दुख दूना।

जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण-
छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना।

यश है न वैभव है, मान है न सरमाया
जितना ही दौड़ा तू उतना ही भरमाया।
प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्‍णा है,
हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्‍णा है।
जो है यथार्थ कठिन उसका तू कर पूजन-
छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना।

दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंख नहीं,
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्‍या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?
जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्‍य वरण,
छाया मत छूना मन, होगा दुख दूना।

 

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