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अनुभूति में बालकृष्ण शर्मा 'नवीन' की रचनाएँ-

गौरव ग्राम में-
असिधारा पथ

ओस बिंदु सम ढरके
प्राप्तव्य
फागुन
भिक्षा
मधुमय स्वप्न रंगीले
मन मीन
मेह की झड़ी लगी
सदा चाँदनी
साजन लेंगे जोग री
हम अनिकेतन
विप्लव गायन
हिंडोला

दोहों में-
सोलह दोहे

संकलन में-
वर्षा मंगल - घन गरजे

 

भिक्षा

भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर,
विश्व-वेदना के कल जल से
आप्लावित कर दो अभ्यंतर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

छलका दो मेरी वाणी में
अचर-सचर की विगलित करुणा
समवेदना-भावना से तुम कंपित
कर दो यह हिय थर-थर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

नभ-जल-थल से अनिल-अनल में
करुण मोहिनी छवि दिखला दो,
पुलक-पुलक बह आने दो, प्रिय,
मेरे नयनों का लघु निर्झर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

इठलाते कुसुमों का मादक
परिमल मन-नभ में फैला है,
अपनी निर्गुण गंध-किरण से
चिर निर्धूम करो मम अंबर,
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

मेरी मुग्धा व्यथा परिधिगत
हुई - उसे नि:सीम बना दो,
मुक्त करो, प्रिय, मुक्त करो मम
करुणा-वीणा के ये सुस्वर
भर दो, प्रिय, भर दो अंतरतर।

१ अगस्त २००५

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