अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में ज़किया ज़ुबैरी की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
अल्युम्युनियम के प्याले वाले कुत्ते

उलझन
ढाल
धूप का ढलता साया
फिर बदल गया

छंदमुक्त में-
और बच्चे खेलते रहे
क्या उसे हक़ था
खारदार झाड़ियाँ
दो खुली आँखें
ये कैसा ख़ौफ़ है

 

क्या उसे हक़ था?

क्या उसे हक़ था?
बिना संभले गिरना
अपने बदन से
मेरा लहू बहने देना।
क्या उसे हक़ था?
दिल की धड़कन
बदहवास, बेलग़ाम
हस्पताल का इंतज़ार
एक्सरे, ईसीजी
ज़ख़्म की सफ़ाई, टाँके
क्या उसे हक़ था?
भूल जाती है वह
मैं उसमें साँस लेती हूं
उसका दिल धड़कता है
मेरे सीने में, फिर
क्या उसे यह हक़ था?
टंका हुआ सिर
चिपचिपाते लाल बाल
रखती है सिर
मेरे धड़कते सीने पर
हाँ उसे यह हक़ है?

१२

hit counter
जुलाई २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter