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अनुभूति में ज़किया ज़ुबैरी की रचनाएँ-

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अल्युम्युनियम के प्याले वाले कुत्ते

उलझन
ढाल
धूप का ढलता साया
फिर बदल गया

छंदमुक्त में-
और बच्चे खेलते रहे
क्या उसे हक़ था
खारदार झाड़ियाँ
दो खुली आँखें
ये कैसा ख़ौफ़ है

 

अल्युम्युनियम के प्याले वाले कुत्ते

सुपरमार्केट की उन दीवारों से लिपटे
कंपकंपाती सर्दी में बाहर बैठे
अन्दर चकाचौंध रोशनी में रखे वो खाने
और घूरते हुए बच्चे!

हाथों में अल्युम्युनियम के प्याले
और कुछ के पास
प्याले भी नहीं -
उनके हाथ भी सूखे और काले काले
बन जाते हैं
पपड़ी वाले प्याले!

पानी पीने के लिये वही प्याले
बन जाते हैं गिलास
और वो बच्चे
गन्दा ठण्डा और गंदला पानी पी कर
भर लेते हैं पेट।

सुपरमार्केट के फ़्रीज़र
अपना पेट खाने से भरे,
बैठे करते हैं इन्तज़ार
उन लोगों का, जिनके
पेट भरे – जेब भरे
और क्रिस्टल के गिलास भरे
हर उस मशरूव से जो
बुझाते हैं
उनकी हर तरह की प्यास।

अल्यूम्यूनियम के वो प्याले भी
पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे हैं
ज़िन्दगी की मार खा खा कर
ज़ख़्मी हो गये हैं।
पिटे हुए उन प्यालों में
जगह जगह भर गई है मैल!
उनको धोने के लिये भी
पानी मय्यस्सर नहीं।
म्युनिसपैलिटी के वो नलके
जो सीना ताने खड़े हैं
मगर अन्दर से उनको भी
पड़ चुकी है
अफ़सरशाही की मार।
उन्हें भी तपेदिक ने जकड़ लिया है।

वो बच्चे कान खोल आँखें गड़ाए
देखते रहते हैं, कि शायद
एक क़तरा ज़िन्दगी का
उनको भी हासिल हो जाए।
शायद सुपरमार्केट में आने जाने वाले
एक नज़र उनको भी देख लें
ज़िन्दगी उनको भी हासिल हो जाए।

उम्मीद में बैठे, आस लगाए
थक कर, वो बच्चे, रुख़ करते हैं
कूड़े की बड़ी सी बिन का
उस बिन का जिस में फ़्रीज़र
खाली किये जा चुके हैं।
जिसमें से खाने की सोंधी सोंधी
महक बच्चे महसूस करते हैं।

कुत्ते और बच्चे साथ साथ
मुक़ाबले में जुट जाते हैं।
कुत्तों के मालिक
नहीं कर पाते बरदाश्त
यह समां।
दौड़ कर पहुँच जाते हैं
कुत्तों के पास।

कुत्तों को प्यार से डाँटते और
फिर चुमकारते हैं.
और पट्टा पकड़ कर साथ
लेजाते हुए, तम्बीह करते हैं
कुत्तों के खानों से भरी हुई टोकरी
जिसमें ट्यूना फ़िश, बीफ़ और चिकन
के डिब्बे होते हैं, कुत्तों को दिखाते हैं
पीठ थपथपाते हैं, चुमकारते हैं
और इशारों इशारों में समझाते हैं
कि उनका मक़ाम क्या है
कहाँ तक हैं हदें उनकी।

वो बच्चे जिनकी कीचड़ भरी आँखें
जिनकी बहती नाक
जिनकी ख़ुश्क खुरदरे और नंगे बदन
तुम्हारे लायक नहीं – मेरे प्यारे कुत्ते
अब घर जाकर तुमको नहलाना होगा
ब्रश भी करना होगा
एअरकंडीशन कमरे में
खाने के डिब्बे खोल कर
खाना खिलाना होगा।
तुमको प्यार से, मुहब्बत से
चुमकार के थपथपा के।

और बच्चे -
खड़े खड़े सुनते रहते हैं।
उनके जिस्म का हर हिस्सा और ढीला हो कर
झूल जाता है।
सिर्फ़ इतना बोल पाते हैं
वो बच्चे – अपनी ख़ुश्क और
फँसी फँसी आवाज़ में
ख़ौफ़ज़दा से -
सर, क्या हम भी आपके कुत्ते बन सकते हैं।

१८ अक्तूबर २०१० 

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