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अंजुमन में--
इस उमर में दोस्तों
कैसे कह दूँ
ज़िन्दगी को मज़ाक में लेकर

तो लिखा जाता है
मेरी मजबूर सी यादों को
मैं जानता था

कविताओं में--
आदमी की ज़ात बने
पुतला ग़लतियों का
प्रजा झुलसती है
मकड़ी बुन रही है जाल
शैरी ब्लेयर
हिंदी की दूकानें 

संकलन में—
दिये जलाओ–कहाँ हैं राम

 

मैल

मुझे धोने हैं आज
भीतरी कपड़े
लगने लगे हैं
मैले से!

गीली हो गई है
परछांई मेरी
भला बारिश में
कैसे सुखाऊं?

आंसू भी लगते हैं
नाराज़ से
भूल गए हैं रास्ता
आंखों से बाहर आने का!

तसल्लियां देने से क्या होगा
मैल बहुत गहरा है
आंसुओं की बरसात भी
साफ़ न कर पाएगी!

१७ मई २०१०

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