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अंजुमन में--
इस उमर में दोस्तों
कैसे कह दूँ
ज़िन्दगी को मज़ाक में लेकर

तो लिखा जाता है
मेरी मजबूर सी यादों को

मैं जानता था

कविताओं में--
आदमी की ज़ात बने
पुतला ग़लतियों का
प्रजा झुलसती है
मकड़ी बुन रही है जाल
शैरी ब्लेयर
हिंदी की दूकानें 

संकलन में—
दिये जलाओ–कहाँ हैं राम

 

कैसे कह दूँ


कैसे कह दूँ कि तुम्हें, याद नहीं करता हूँ
दर्द सीने में हैं, फ़रियाद नहीं करता हूँ

तेरा नुक्सान करूं सोच नहीं सकता मैं
मैं तो दुश्मन को भी बरबाद नहीं करता हूँ

तेरी तारीफ़ सदा सच्ची ही की है मैने
झूठे अफ़साने मैं ईजाद नहीं करता हूँ

साक़ी पैमाने से यारो मुझे है क्या लेना
किसी मैख़ाने को आबाद नहीं करता हूँ

मेरे अरमानों को तुमने है कुचल डाला सनम
मैं शिकायत कभी सय्याद नहीं करता हूँ

२१ जनवरी २००८  

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