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नयी कविताओं में-
अपने को मिटाना सीखो
एक दिन

ये मेरे कामकाजी शब्द

कविताओं में-
उभरूँगा फिर
एक धुन की तलाश
गुज़रे कल के बच्चे
घर लौट रहे बच्चे
चलती है हवा
जापान में पतझर
झरती पत्तियों ने
दिन दिन और दिन

ध्वन्यालेख तन्मयता के
निराला को याद करते हुए
मुक्ति
मौसम
लक्ष्य संधान
वसंत से वसंत
सार्थक है भटकाव

सुनो सुनो

  सार्थक है भटकाव

सार्थक है भटकाव
कि दिशा देता है।
टूटन का इतिहास
बन चंदन महकता है।

सृजन-ज्वार
कल्पना की नाव को
कहाँ से कहाँ
ले जा पटकता है

घनघोर घुमड़न के बीच
किसी शब्द-ऋषि का मन
डूब, डोलता है।

आकाशदीप-सी चमकती आँखों में
झिलमिल स्वप्न-शिशु का
गुदगुदा जिस्म ढलता है।

सीपिया पलकों में पल
रचना का मोती
आँसू बन टपकता है।
यों बार-बार

कवि का निजत्व
समर्पित होता है।
टूटन का इतिहास
बन चंदन महकता है।

सार्थक है भटकाव
कि दिशा देता है।

१६ जनवरी २००६

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