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विदा की अगन

मैं कोयला हूँ कहो तो आग दूँ
या फिर धुआँ कर दूँ।
मुझे डर है ना दर्देदिल
निगाहों से बयाँ कर दूँ।

मुझे अफ़सोस है तुमने मुझे
अपना नहीं समझा।
खुशी तो बाँट ली मुझ से
मगर गम पास ही रखा।

सुना था दिल की मिट्टी में
ये गम बन फूल खिलता है।
बेगरज दोस्त दुनिया में
बड़ी किस्मत से मिलता है।

चलो छोड़ो गिले शिकवे
विदा होने की बारी है।
इस कोयले में चमक जो है
अमानत वो तुम्हारी है।

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