अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में रेखा राजवंशी की रचनाएँ —

नई रचनाओं में-
अपनों की याद
दर्द के पैबंद
पिता
माँ दो कविताएँ
वक्त के पैबंद

छंदमुक्त में—
कंगारुओं के देश से
जिंदगी छलने लगी
ढूँढ रही हूँ चंदन
दोस्ती
पिघलता अस्तित्व
बचपन के दिन
बदलाव
भाई को चिट्ठी
विदेश में भारत
सफर एक औरत का
संदूक

छोटी कविताओं में—
संगति
कैक्टस
रोको मत
लक्ष्मी

 

वक्त के फंदे

शीत लहर चलती है
तो स्वेटर, कोट निकल आते हैं
दस्ताने, मफलर, टोपी
कुछ बातों को दोहराते हैं

कि कार के शीशे में
जमने लगते हैं
बर्फ बन कर
इसके, उसके, तुम्हारे ख्याल
हथेली पर उगने लगते हैं
कुछ बीते साल
प्रश्नचिन्ह पीछा करते हैं
और अनुत्तरित ही रहते हैं
कुछ अनुत्तरित सवाल।

नन्हे- नन्हे दस्तानों में कैद
बच्चे की बेचैन उँगलियों से
उधड़ने लगते हैं
वक्त के फंदे।
जाने कब
लिपटने लगते हैं
ऊन के गोले में
याद के परिंदे।

कि मैं ढूँढने दौड़ती हूँ
पुरानी अलमारी के
किसी कोने में दबी
माँ की दी हुई
बुनने की सिलाई
जाने कितने सालों से
जो मुझे
याद नहीं आई।

कि उधड़ते फंदे उठाती हूँ
उलझा ऊन सुलझाती हूँ
और यादों के दस्ताने पहन
छोटी बच्च्ची बन जाती हूँ।

२८ नवंबर २०११

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter