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कौन कहता है
ग़म गुसारों की बात
दरमियाँ यों न फ़ासिले होते
नाज़बरदारियाँ नहीं होतीं
मेरे हाथों की लकीरों में

वो एक चाँद-सा चेहरा

अंजुमन में-
अपनी नज़र से
किस तरह
जो भी मिलता है
प्यार के काबिल नहीं
मेरे वजूद में
रंगों की बौछार

 

नाज़बरदारियाँ नहीं होतीं

नाज़बरदारियाँ नहीं होतीं
हमसे मक़्क़ारियाँ नहीं होतीं

दिल में जो है वही ज़बान पे है
हमसे अय्यारियाँ नहीं होतीं

कम न होती ज़मीं ये जन्नत से
गर ये बदकारियाँ नहीं होतीं

इतनी पी है कि होश हैं गुम—सुम
अब ये मय-ख़्वारियाँ नहीं होतीं

अब यहाँ बुज़दिलों के डेरे हैं
अब वो सरदारियाँ नहीं होती

जिन रुख़ों पर सजी हो शर्म-ओ-हया
उनपे फुलकारियाँ नहीं होती

'चाँद'! जलते चिनार देखे हैं
मुझसे गुलकारियाँ नहीं होती।

२२ सितंबर २००८

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