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विवेक

विवेक को
तट पर उतार कर
नाव को छोड़ा
हवा के रुख़ पर
तो किनारा
कहाँ मिलेगा?

सहारा

किसी का सहारा लेने के क्षण
मेरे अंदर
एक बहुत बड़ी इमारत
हहरा कर ढह जाती है
खंडहर रह जाते हैं
गिरने का भय और बढ़ जाता है
और मैं
सहारे को मज़बूती से पकड़ लेती हूँ
बहुत कमज़ोर महसूस करती हूँ।
गर इमारत ही न होती,
न होता भय ढहने का!

24 फरवरी 2007

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