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साँझ
सृजन

 

सृजन

मैं
हर शब्द के साथ
पंखुडी-पंखुडी झरता हूँ
कनी-कनी मिटता हूँ
तिल-तिल मरता हूँ
हर कविता के साथ
कली-कली खिलता हूँ
पोर-पोर विकसता हूँ
नया रूप, नया रंग
नया साज, नया छंद
दिव्य आलोक से स्पंदित
नई चेतना, नए प्राण पाता हूँ।


१ अप्रैल २००४

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