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सृजन

 

अभिलाषा

मुझे
उतना भर
झर जाने दो
जितना पावस की फुहार से
झरती हैं फूलों की पंखुडियाँ
मुझे
उतना भर दो
तन जाने दो
जितना शर-दर्प से
तनती है पौरुष की प्रत्यंचा
मुझे
उतना भर
जल जाने दो
जितना मेरी ही साँसों से
जलती है मेरे जीवन की समिधा।

१ अप्रैल २००४

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