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बसंत

जो आए वह न बसंत है
जो जाए वह न बसंत है
जो चिर यौवन की छाया
बनकर छाए वही बसंत है।
वह ऋतु का नाम नहीं होता
दो पल का जाम नहीं होता
जीवन के इस मयखाने में
पल-पल छलके पैमाने में
बलखाए वही बसंत है।
उत्सव यह अंतर्मन का है
आसव यह चिर जीवन का है
यह रस है, भावुक प्राणों में,
रोकर हंसते अरमानों में
बस जाए वही बसंत है।
सच है, सबकुछ मिट जाएगा
इक रोज़ प्रलय तो आएगा
पर इस पल का आनंद लिए
कुछ बेलौसी का छंद लिए
मिट जाए वही बसंत है।
जो चिर यौवन की छाया
बनकर छाए वही बसंत है।

९ मार्च २००६

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