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एक होली और
बसंत
होली

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बोधिवृक्ष
तुम
 


 

 

होली

कोमल सपने टूट गए हैं,
कुछ अपने थे छूट गए हैं,
भीतर कोई आग धधकती,
हम हंसते हैं - `होली है!'
मधुऋतु मधु-उल्लास भरे है,
क्यों विषण्ण, भग्नाश, अरे! है?
जब प्रफुल्ल विश्वानन, तू भी
राग मिला दे - `होली है!'
अपने आंसू ढार, बटोही!
अर्घ्य चढ़ा दे कलियों को ही
बिछल गिरेंगे ओस द्रुमों पर,
झूम कहेंगे - `होली है!'
सागर बड़वानल पर गिरता,
तारक छिपते, बादल घिरता
व्यक्ति-शोक पर विश्व-हास का
दंभ मचलता - `होली है!'
होली है तो तुम भी नाचो,
आत्मकथा लपटों पर बांचो
अन्तर्जग में आग लगाकर
रस बरसा दो - `होली है!'

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