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अनुभूति में संगीता गोयल की रचनाएँ-

जीवन का अर्थ
जो हट कर रहा है
प्रश्न
सम्प्रति
तीन छोटी कविताएँ

संकलन में
हाथ में प्याला - 'गाँव' में अलाव में

 

संप्रति

वो पल
याद है मुझे आज भी
बिछड़ा जाना पहचाना सभी
पगडंडी बने वहॉं जहॉं रास्तों की होड़ नहीं
मेरा हाथ थामा
मैंने खुद ही
मैं ही औज़ार
मैं ही कलाकार बनी
उपलब्धि ?
हथेली पर सजे
पूर्ण पलों के
श्वेत कुछ मोती!!!
संप्रति
सत्य की
भूख को आंकती
ज़िंदगी।

 

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