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अनुभूति में रति सक्सेना की रचनाएँ

कविताओं में -
अंधेरों के दरख्त
अधबने मकानों में खेलते बच्चे
अल्जाइमर के दलदल में माँ
उसका आलिंगन
उसके सपने
जंगल होती वह
जनसंघर्ष
टूटना पहाड क़ा
तमाम आतंकों के खिलाफ़
प्लास्टिकी वक्त में
बाजारू भाषा
बुढिया की बातें
भीड में अकेलापन
मौत और ज़िन्दगी
याद
वक्त के विरोध में
रसोई की पनाह
सपने देखता समुद्र

 

प्लास्टिकी वक्त में

आज मैंने समेट लिए
वे तमाम पाए अनपाए खिलौने
और उन्हें बनाती कल्पनाएँ
कल्पनाओं से निकले बीज
बीज से अनफूटे किल्ले
यों भी
इस प्लास्टिकी वक्त में
जगह भी कहाँ बची है
अवधूत से खिलंदडीपन के लिए

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